Saturday, October 20

Author: Dhirendra Panchal

धीरेन्द्र पांचाल

धीरेन्द्र पांचाल

शायरी
गाँधी जयन्ती विशेष........ बापू बन तु चमका जग में , तु डायर संग घुल गया । साज़िश चली अहिंसा वाली आहुति जग भूल गया । आतंकी कह शोभित करते दरबारी उस महिमा को , फाँसी के फंदे को जो वरमाल समझ के झूल गया । ✍🏻✍🏻धीरेन्द्र पांचाल.......
किशन झा

किशन झा

कविताएं
जिंदगी कितना धीरे चल रहा हूं मैं............ खुद के भी पीछे खड़ा हूं मैं जिंदगी कितना धीरे चल रहा हूं मैं जो हसीन ख्वाब आते थे जगाने उन्हें देखते हुए सोया पड़ा हूं मैं, जिंदगी कितना धीरे चल रहा हूं मैं ख्वाहिशें जो बिन मांगे पूरी हो जाया करती थी आज उन्हीं ख्वाहिशों को पूरी करने अपना सब कुछ छोड़ चला हूं मैं, जिंदगी कितना धीरे चल रहा हूं मैं वह मां का प्यार , पिता की डांट, बहन से झगड़ा , दोस्त की दोस्ती और कई अपनों का प्यार ख्वाहिशों के लिए छोड़ चला हूं मैं, जिंदगी कितना धीरे चल रहा हूं मैं जिंदगी तन्हा सी हो गई ना ख्वाहिशें पूरी हो रही, ना अपने पास रहे सपनों को पाने में खुद को भूल गया हूं मैं , जिंदगी कितना धीरे चल रहा हूं मैं खुद के भी पीछे खड़ा हूं मैं जिंदगी कितना धीरे चल रहा हूं मैं   :-किशन झा
अमित मिश्रा

अमित मिश्रा

कविताएं
  शिक्षक दिवस पर निवेदित ...... ज्ञानचक्षु के धारा है गुरु, स्वतः के प्रकाश से प्रकाशित तारा है गुरु। जीवन के आधार है गुरु, कठोरता से परिपूर्ण प्यार है गुरु। जग के रचैता है गुरु, इनके ही मार्गदर्शन से होता अच्छा मनुष्य बनने का कार्य शुरू। स्वयं में ब्रह्मा,विष्णु,महेश है गुरु , मनुष्य के रचैता व विध्वंसकर्ता है गुरु। अंधकार रूपी इस भवर के तारणकर्ता है गुरु, अपने प्रकाश से उजाले की ओर ले जाने वाले कर्ता है गुरु। गुरु से ही अर्थ है, बिन गुरु ये जीवन व्यर्थ है। :-अमित मिश्रा
अमित मिश्रा

अमित मिश्रा

कविताएं
  'आजाद है हम'................... आजादी है हमें उन गोरों के गुलामी से,आजादी है हमें उन क्रूर शासकों के पैमानों से। आजादी हैं हमें अपने विचारों से मगर ये कैसी आजादी जिसमे होता भ्रष्टाचार है,अगर आजाद हैं हम तो होता कैसे बलात्कार है? आजादी हैं हमें अपने बातों में,फिर लड़कियां क्यों डरती है अंधेरी रातों में? आजादी है हमे मशहूर होने को लेकर फिर कोई क्यों चला जाता है गरीबी के कारण इस दुनियां को छोड़कर। आजादी है हमें दौलत-शौहरत कमाने में,फिर क्यों सिसकता है एक शहीद जवान का परिवार इस जमाने में। निवेदन संग आवेदन है मेरा अपने देश के प्रतिनिधियों से,मुझे दिक्कत है आपलोग के इन राजनीतिक विधियों से। कब-तक आप बस अपनी रोटी सकेंगे,जब कभी आप पे गुजरी तो अपने बनाये सिस्टम में खुदको नाचते देखेंगे। हम आजाद है आजादी हमे सबसे न्यारी है,ये हमारा भारतदेश है जो प्राणों से अधिक हमें प्य
अजीत मालवीया “ललित”

अजीत मालवीया “ललित”

आलेख
  || अपरिपक्व शिक्षक ||................ शिक्षक सभी पदों में महत्वपूर्ण पद होता है लेकिन शिक्षक जब से व्यापारी हुआ है, तब से शिक्षा का मूल्य भी काफी हद तक गिर गया है। जब से शिक्षक व्यापारी हुआ है, तब से शिक्षा केवल नाम की ही रह गई है। शिक्षक जब से व्यापारी हुआ है, तब से उसने विद्यार्थी को समझना ही बंद कर दिया है। वह केवल अपनी धुन में रम्य स्वयं को पुरोहित समझ रहे है।           यह जानते हुए भी कि आज जो मैं मैं लिख रहा हूं वह भी एक शिक्षक की बदौलत ही है, किंतु जो सत्य है उसे अधिक समय तक दबाकर नहीं रखा जा सकता या यूं कहूं कि वह स्वयं ही अधिक समय तक दबकर नहीं रह सकता है और इसका मुख्य कारण यह है कि जो पुराने शिक्षक थे या हैं उनसे नए शिक्षकों की तुलना करने पर पुराने ही भारी पड़ते हैं। यह जानते हुए भी कि जमाना हाईटेक हो गया है, सभी को वर्तमान परिस्थिति में ढल जाना चाहिए किंतु क्या ह
धीरेन्द्र पांचाल

धीरेन्द्र पांचाल

शायरी
शायरी....... चट्टानों को तोड़ दिया है ,कुछ हँसमुख चौराहों ने । रिश्ते चकनाचुर कर दिए,क़ातिल भरी निगाहों ने, जब हँसी ठिठोलि ग़ैरों से हो,अपना भाई ज़हर लगे, फिर मस्जिद से क्या ख़ता हुई,जब क़त्ल किया ईदगाहों नें । धीरेन्द्र पांचाल......
अमित मिश्रा

अमित मिश्रा

आलेख
मिथिला क प्रतीक आ शान :- पान,मखान, माछ आ पाग............ पान.... पान के पेशकश मिथिला में सम्मान के प्रतीक होइत ऐच्छ। दरभंगा के पान कोलकाता के पान बजार में एकटा विशेष स्थान रखइत ऐच्छ। गत कतेक वर्ष में मिथिला में पान के खेती में बहुत गिरावट आइल ऐच्छ। मिथिला में चौरसिया समुदाय के लोक जादा पान के खेती करैत छैथ, मिथिला में पान के बिना कोनो भी शुभ कार्य के पूरा नहीं कैल जाईत ऐच्छ। ई विवाह अनुष्ठान सब में सेहो इस्तेमाल होईत ऐच्छ और भैया दूज जैहेन त्योहार में सेहो। अपन मिथिला में अतिथि के स्वागत सेहो एकटा पान स कैल जाइत ऐच्छ। मखान.... मखान मिथिला में पानी के भंडार के कारण लोकप्रिय ऐच्छ व एकर बहुत रास सांस्कृतिक कार्य मे सेहो बहुत महत्व ऐच्छ।गत किछ साल में मखान के मांग नई केवल अपन देश परन्तु विदेश में सेहो वृद्धि भेल ऐच्छ।ई एकतरहक स्नैक फूड सेहो ऐच्छ जे लोकप्रिय ऐच्छ कियाकि अहि में प्रोटीन,
जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

कविताएं
. मन भीतरि समाइल ----------------------- अचके छोड़ि पराइल ई मूढ़ मतिया। मन भीतरि समाइल माहुर बतिया। साँझ बेवा नीयन लोर छलका गइल भाव भंगुआइल, छाव बसिया गइल भोरे कूंहुकल करेज फटल छतिया। मन भीतरि समाइल माहुर बतिया। रउंदल मनवा से गफलत मे जीयल मउरल जिनगी के सुधिया से सीयल बहुरल ना तबहूँ बिरहिन के रतिया। मन भीतरि समाइल माहुर बतिया। मनवा क पिरिया सुनुगे आ धधके चितवन बिसारी जस अदहन खदके कबहूँ न संवरी छितिराइल थतिया। मन भीतरि समाइल माहुर बतिया। • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
राजेश “राजू”

राजेश “राजू”

कविताएं
  लोक लाज आज सब दबाई गईल फैशन से। नर हौ की नारी न अंतर जनात बा।। शिष्टाचार सभ्यता किताबी मे बन्द भईल। अश्लीलता ही अब महान भईल जात बा।। शासन भूलाइल अनुशासन क पाठ बस। भाषण के राशन से पेट भर जात बा।। कली के प्रभाव से अभाव भईल शिक्षा क।   समाज क बुराई आधुनिकता कहात बा ।। राजेश विश्वकर्मा “राजू” सिकंदरपुर,चकिया,चन्दौली, u.p.
अविनाश शर्मा

अविनाश शर्मा

कविताएं
मोहब्बत की यादें......................... हमने जो की थी मोहब्बत वो याद आज भी है, तेरी मुस्कान और बचकानी बातें वो याद आज भी है। तेरे लिए तो हर खुशी मांगी थी रब से, पर जो जख्म मिला मुझे वो याद आज भी है। दिया था जब अपनी तस्वीर वो याद आज भी है, लबों से जो मुस्कुराई वो याद आज भी है। चाहता तो चुरा लेता तुझे इस जहां से, लेकिन घरवालो से मिलें संस्कार वो याद आज भी है। बताई जब अपनी सगाई की बात वो याद आज भी है, नजर न मिला सकी हमसे वो याद आज भी है। नही करूँगा मोहब्बत अब कभी किसी से, क्योकि कांच की तरह बिखर गया था वो याद आज भी है। अविनाश शर्मा(पांचाल) भीषमपुर चकिया,चंदौली उत्तर प्रदेश(UP)