Saturday, October 20

कविताएं

कविताएं

किशन झा

किशन झा

कविताएं
जिंदगी कितना धीरे चल रहा हूं मैं............ खुद के भी पीछे खड़ा हूं मैं जिंदगी कितना धीरे चल रहा हूं मैं जो हसीन ख्वाब आते थे जगाने उन्हें देखते हुए सोया पड़ा हूं मैं, जिंदगी कितना धीरे चल रहा हूं मैं ख्वाहिशें जो बिन मांगे पूरी हो जाया करती थी आज उन्हीं ख्वाहिशों को पूरी करने अपना सब कुछ छोड़ चला हूं मैं, जिंदगी कितना धीरे चल रहा हूं मैं वह मां का प्यार , पिता की डांट, बहन से झगड़ा , दोस्त की दोस्ती और कई अपनों का प्यार ख्वाहिशों के लिए छोड़ चला हूं मैं, जिंदगी कितना धीरे चल रहा हूं मैं जिंदगी तन्हा सी हो गई ना ख्वाहिशें पूरी हो रही, ना अपने पास रहे सपनों को पाने में खुद को भूल गया हूं मैं , जिंदगी कितना धीरे चल रहा हूं मैं खुद के भी पीछे खड़ा हूं मैं जिंदगी कितना धीरे चल रहा हूं मैं   :-किशन झा
अमित मिश्रा

अमित मिश्रा

कविताएं
  शिक्षक दिवस पर निवेदित ...... ज्ञानचक्षु के धारा है गुरु, स्वतः के प्रकाश से प्रकाशित तारा है गुरु। जीवन के आधार है गुरु, कठोरता से परिपूर्ण प्यार है गुरु। जग के रचैता है गुरु, इनके ही मार्गदर्शन से होता अच्छा मनुष्य बनने का कार्य शुरू। स्वयं में ब्रह्मा,विष्णु,महेश है गुरु , मनुष्य के रचैता व विध्वंसकर्ता है गुरु। अंधकार रूपी इस भवर के तारणकर्ता है गुरु, अपने प्रकाश से उजाले की ओर ले जाने वाले कर्ता है गुरु। गुरु से ही अर्थ है, बिन गुरु ये जीवन व्यर्थ है। :-अमित मिश्रा
अमित मिश्रा

अमित मिश्रा

कविताएं
  'आजाद है हम'................... आजादी है हमें उन गोरों के गुलामी से,आजादी है हमें उन क्रूर शासकों के पैमानों से। आजादी हैं हमें अपने विचारों से मगर ये कैसी आजादी जिसमे होता भ्रष्टाचार है,अगर आजाद हैं हम तो होता कैसे बलात्कार है? आजादी हैं हमें अपने बातों में,फिर लड़कियां क्यों डरती है अंधेरी रातों में? आजादी है हमे मशहूर होने को लेकर फिर कोई क्यों चला जाता है गरीबी के कारण इस दुनियां को छोड़कर। आजादी है हमें दौलत-शौहरत कमाने में,फिर क्यों सिसकता है एक शहीद जवान का परिवार इस जमाने में। निवेदन संग आवेदन है मेरा अपने देश के प्रतिनिधियों से,मुझे दिक्कत है आपलोग के इन राजनीतिक विधियों से। कब-तक आप बस अपनी रोटी सकेंगे,जब कभी आप पे गुजरी तो अपने बनाये सिस्टम में खुदको नाचते देखेंगे। हम आजाद है आजादी हमे सबसे न्यारी है,ये हमारा भारतदेश है जो प्राणों से अधिक हमें प्य
जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

कविताएं
. मन भीतरि समाइल ----------------------- अचके छोड़ि पराइल ई मूढ़ मतिया। मन भीतरि समाइल माहुर बतिया। साँझ बेवा नीयन लोर छलका गइल भाव भंगुआइल, छाव बसिया गइल भोरे कूंहुकल करेज फटल छतिया। मन भीतरि समाइल माहुर बतिया। रउंदल मनवा से गफलत मे जीयल मउरल जिनगी के सुधिया से सीयल बहुरल ना तबहूँ बिरहिन के रतिया। मन भीतरि समाइल माहुर बतिया। मनवा क पिरिया सुनुगे आ धधके चितवन बिसारी जस अदहन खदके कबहूँ न संवरी छितिराइल थतिया। मन भीतरि समाइल माहुर बतिया। • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
राजेश “राजू”

राजेश “राजू”

कविताएं
  लोक लाज आज सब दबाई गईल फैशन से। नर हौ की नारी न अंतर जनात बा।। शिष्टाचार सभ्यता किताबी मे बन्द भईल। अश्लीलता ही अब महान भईल जात बा।। शासन भूलाइल अनुशासन क पाठ बस। भाषण के राशन से पेट भर जात बा।। कली के प्रभाव से अभाव भईल शिक्षा क।   समाज क बुराई आधुनिकता कहात बा ।। राजेश विश्वकर्मा “राजू” सिकंदरपुर,चकिया,चन्दौली, u.p.
अविनाश शर्मा

अविनाश शर्मा

कविताएं
मोहब्बत की यादें......................... हमने जो की थी मोहब्बत वो याद आज भी है, तेरी मुस्कान और बचकानी बातें वो याद आज भी है। तेरे लिए तो हर खुशी मांगी थी रब से, पर जो जख्म मिला मुझे वो याद आज भी है। दिया था जब अपनी तस्वीर वो याद आज भी है, लबों से जो मुस्कुराई वो याद आज भी है। चाहता तो चुरा लेता तुझे इस जहां से, लेकिन घरवालो से मिलें संस्कार वो याद आज भी है। बताई जब अपनी सगाई की बात वो याद आज भी है, नजर न मिला सकी हमसे वो याद आज भी है। नही करूँगा मोहब्बत अब कभी किसी से, क्योकि कांच की तरह बिखर गया था वो याद आज भी है। अविनाश शर्मा(पांचाल) भीषमपुर चकिया,चंदौली उत्तर प्रदेश(UP)
निखिल तिवारी

निखिल तिवारी

कविताएं
देखो कितना परेशान है ज़िंदग़ी........... कभी खुशी तो कभी आंशु का गुलाम है ज़िन्दगी देखो कितना परेशान है ज़िंदग़ी । कभी अपनो को मनाने में तो कभी सपनो को सजाने में कितना बेवस लाचार है ज़िंदगी देखो कितना परेशान है ज़िन्दगी । कभी धूप कभी छाया में कभी सत्य कभी माया में अपनो की धक्कों से लाचार है जिंदगी देखो कितना परेशान है जिंदगी । महफ़िलो में नज़र नही आती है तन्हाई में दुश्मन बन जाती है कभी जी भर के हँसाती है ज़िन्दगी तो कभी जी भर के रुलाती है ज़िंदगी देखो कितना परेशान है जिंदगी । किसी के अहंकार का ताज है तो किसी की दो रोटी का मोहताज़ है ज़िन्दगी किसी की अपनो के ठोकरों से रुलाती है तो किसी ने अपनो की उम्मीदों से सजाया है जिंदगी देखो कितना परेशान है जिंदगी । निखिल तिवारी रामपुर,सैयदराजा चंदौली (उ0 प्र0)
राहुल विश्वकर्मा

राहुल विश्वकर्मा

कविताएं
  जब से मिली है तू मुझे, मैं तेरी ही बाते करता हूं। तेरी ही यादों में अब तो , दिन रात मैं खोया रहता हूँ। देकर मुझको इतना दर्द, तुम खुश कैसे रहती होगी। करके याद हमें तुम भी तो, रातो रातो रोती होगी। दिया है दिल का दर्द मुझे, सहने की कोशिश करता हूं, तेरी ही यादो में अब तो, दिन रात मैं खोया रहता हूँ। हाथ में लेकर फ़ोटो तेरी, एकटक निहारता रहता हूँ। लाख कर तू हँसाने की कोशिश, रातो में रोया करता हूं। तेरी ही यादों में अब तो, दिन रात मैं खोया रहता हूं। तेरी ही यादों में अब तो, दिन रात में खोया रहता हूँ। राहुल विश्वकर्मा भिषमपुर चकिया जिला-चंदौली(उत्तर प्रदेश)
अमित मिश्रा

अमित मिश्रा

कविताएं
  कल हो ना हो….....   जी लो इस पल को कल हो ना हो, कल के भरोसे मत बैठो कल हो ना हो। जीवन के हर जंग से आज लड़ो कल हो ना हो, रिश्तों के हर रंग को आज भरो कल हो ना हो। हर सपने को पूरा करो कल हो ना हो, हर अपने को खुश रखो कल हो ना हो। कल का सोच के आज मत बैठो कल हो ना हो, आज करो सब काम अधूरे कल हो ना हो। जीवन एक मायाजाल है ये माया कल हो ना हो, सब अपने है लेकिन सपने क्या पता कल हो ना हो। जी लो इस पल को कल हो ना हो, कल के भरोसे मत बैठो कल हो ना हो। :-अमित मिश्रा
शम्भू नाथ शर्मा “दरदी “

शम्भू नाथ शर्मा “दरदी “

कविताएं
  गीत क्या है......... व्यथा ही गीत बनती है , व्यथा संगीत बनती है , व्यथा गाथा करुण स्वर में हो , कोकिल गीत बनती है | शम्भू नाथ शर्मा "दरदी " भीषमपुर ,चकिया ,चन्दौली , u.p.