Tuesday, August 21

कविताएं

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जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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. मन भीतरि समाइल ----------------------- अचके छोड़ि पराइल ई मूढ़ मतिया। मन भीतरि समाइल माहुर बतिया। साँझ बेवा नीयन लोर छलका गइल भाव भंगुआइल, छाव बसिया गइल भोरे कूंहुकल करेज फटल छतिया। मन भीतरि समाइल माहुर बतिया। रउंदल मनवा से गफलत मे जीयल मउरल जिनगी के सुधिया से सीयल बहुरल ना तबहूँ बिरहिन के रतिया। मन भीतरि समाइल माहुर बतिया। मनवा क पिरिया सुनुगे आ धधके चितवन बिसारी जस अदहन खदके कबहूँ न संवरी छितिराइल थतिया। मन भीतरि समाइल माहुर बतिया। • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
राजेश “राजू”

राजेश “राजू”

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  लोक लाज आज सब दबाई गईल फैशन से। नर हौ की नारी न अंतर जनात बा।। शिष्टाचार सभ्यता किताबी मे बन्द भईल। अश्लीलता ही अब महान भईल जात बा।। शासन भूलाइल अनुशासन क पाठ बस। भाषण के राशन से पेट भर जात बा।। कली के प्रभाव से अभाव भईल शिक्षा क।   समाज क बुराई आधुनिकता कहात बा ।। राजेश विश्वकर्मा “राजू” सिकंदरपुर,चकिया,चन्दौली, u.p.
अविनाश शर्मा

अविनाश शर्मा

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मोहब्बत की यादें......................... हमने जो की थी मोहब्बत वो याद आज भी है, तेरी मुस्कान और बचकानी बातें वो याद आज भी है। तेरे लिए तो हर खुशी मांगी थी रब से, पर जो जख्म मिला मुझे वो याद आज भी है। दिया था जब अपनी तस्वीर वो याद आज भी है, लबों से जो मुस्कुराई वो याद आज भी है। चाहता तो चुरा लेता तुझे इस जहां से, लेकिन घरवालो से मिलें संस्कार वो याद आज भी है। बताई जब अपनी सगाई की बात वो याद आज भी है, नजर न मिला सकी हमसे वो याद आज भी है। नही करूँगा मोहब्बत अब कभी किसी से, क्योकि कांच की तरह बिखर गया था वो याद आज भी है। अविनाश शर्मा(पांचाल) भीषमपुर चकिया,चंदौली उत्तर प्रदेश(UP)
निखिल तिवारी

निखिल तिवारी

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देखो कितना परेशान है ज़िंदग़ी........... कभी खुशी तो कभी आंशु का गुलाम है ज़िन्दगी देखो कितना परेशान है ज़िंदग़ी । कभी अपनो को मनाने में तो कभी सपनो को सजाने में कितना बेवस लाचार है ज़िंदगी देखो कितना परेशान है ज़िन्दगी । कभी धूप कभी छाया में कभी सत्य कभी माया में अपनो की धक्कों से लाचार है जिंदगी देखो कितना परेशान है जिंदगी । महफ़िलो में नज़र नही आती है तन्हाई में दुश्मन बन जाती है कभी जी भर के हँसाती है ज़िन्दगी तो कभी जी भर के रुलाती है ज़िंदगी देखो कितना परेशान है जिंदगी । किसी के अहंकार का ताज है तो किसी की दो रोटी का मोहताज़ है ज़िन्दगी किसी की अपनो के ठोकरों से रुलाती है तो किसी ने अपनो की उम्मीदों से सजाया है जिंदगी देखो कितना परेशान है जिंदगी । निखिल तिवारी रामपुर,सैयदराजा चंदौली (उ0 प्र0)
राहुल विश्वकर्मा

राहुल विश्वकर्मा

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  जब से मिली है तू मुझे, मैं तेरी ही बाते करता हूं। तेरी ही यादों में अब तो , दिन रात मैं खोया रहता हूँ। देकर मुझको इतना दर्द, तुम खुश कैसे रहती होगी। करके याद हमें तुम भी तो, रातो रातो रोती होगी। दिया है दिल का दर्द मुझे, सहने की कोशिश करता हूं, तेरी ही यादो में अब तो, दिन रात मैं खोया रहता हूँ। हाथ में लेकर फ़ोटो तेरी, एकटक निहारता रहता हूँ। लाख कर तू हँसाने की कोशिश, रातो में रोया करता हूं। तेरी ही यादों में अब तो, दिन रात मैं खोया रहता हूं। तेरी ही यादों में अब तो, दिन रात में खोया रहता हूँ। राहुल विश्वकर्मा भिषमपुर चकिया जिला-चंदौली(उत्तर प्रदेश)
अमित मिश्रा

अमित मिश्रा

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  कल हो ना हो….....   जी लो इस पल को कल हो ना हो, कल के भरोसे मत बैठो कल हो ना हो। जीवन के हर जंग से आज लड़ो कल हो ना हो, रिश्तों के हर रंग को आज भरो कल हो ना हो। हर सपने को पूरा करो कल हो ना हो, हर अपने को खुश रखो कल हो ना हो। कल का सोच के आज मत बैठो कल हो ना हो, आज करो सब काम अधूरे कल हो ना हो। जीवन एक मायाजाल है ये माया कल हो ना हो, सब अपने है लेकिन सपने क्या पता कल हो ना हो। जी लो इस पल को कल हो ना हो, कल के भरोसे मत बैठो कल हो ना हो। :-अमित मिश्रा
शम्भू नाथ शर्मा “दरदी “

शम्भू नाथ शर्मा “दरदी “

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  गीत क्या है......... व्यथा ही गीत बनती है , व्यथा संगीत बनती है , व्यथा गाथा करुण स्वर में हो , कोकिल गीत बनती है | शम्भू नाथ शर्मा "दरदी " भीषमपुर ,चकिया ,चन्दौली , u.p.
सलिल सरोज

सलिल सरोज

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गर अपना ही चेहरा देखा होता आईने में............. गर अपना ही चेहरा देखा होता आईने में तो आज  हुई न होती मुरब्बत ज़माने में ।।1।। गर मशाल थाम ली होती दौरे-वहशत में तो कुछ तो वजन होता तुम्हारे बहाने में ।।2।। जिसकी ग़ज़ल है वही आके फरमाए भी वरना गलतियाँ हो जाती है ग़ज़ल सुनाने में ।।3।। बाज़ार में आज वो नायाब चीज़ हो गए सुना है मज़ा बहुत आता है उन्हें सताने में ।।4।। रूठना भी तो ऐसा क्या रूठना किसी से कि सारी साँस गुज़र जाए उन्हें मनाने में ।।5।। एक उम्र लगी उनके दिल में घर बनाने में अब एक उम्र और लगेगी उन्हें भुलाने में ।।6।। दौलत ही सब खरीद सकता तो ठीक था यहाँ ज़िंदगी चली जाती है इज़्ज़त कमाने में ।।7।। वो आँखें मिलाता ही रहा पूरी महफ़िल में देर तो हो गई मुझ से ही इश्क़ जताने में ।।8।। जिधर देखो उधर ही बियाबां नज़र आता है नदियाँ कहाँ अब मिल पाती हैं मुहाने में ।।9।। गर बाप हो तो  जरूर
बन्धू पाल “बन्धू”

बन्धू पाल “बन्धू”

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बावला जी पर एक छन्द..... सोच दाहिन बाँव नाहीं,कवनो दुराव नाहीं,भाव से भरल भण्डार बावला जी ,                             विविध विधा क सर्वज्ञ मर्मज्ञ रहैं,भोजपुरी माटी क श्रींगार बावला जी। भोजपुरी भेष- भुषा कुलियै लगाव रहै, कविता कला क चमत्कार बावला जी,                         पुरा पूर्वांचल में डंका बजाय गइलैं, भीषमपुर गाँव क हमार बावला जी ।।                         कवि- बन्धू पाल “बन्धू”                         पता-भीषमपुर, चकिया,चन्दौली
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""" असलियत नेता जी के """ झूठ की जमा पहन कर यह अपनी कुर्सी बचाते हैं। असली नेता का हैं यहीं पेशा की अपनी हुकूमत जमाते हैं। ' निवाला छीन कर जनता की ख़ुद की महल बनाना हैं। और ध्यान भटकाने के लिए शहरों में दंगे कराते हैं। ' इनके के डर से लोग चुप्पियाँ साध लेते हैं हर वक़्त। चुप्पियाँ साधने का मतलब इनकी हम हौसला बढ़ाते हैं। ' खिलाफ इनकी जो आवाज उठाने की कोशिश करते हैं। अपनी पैसे और दम-बूते पर उनकी आवाज दबाते हैं। ' वादा किये हुए बातों को भूल जाते है जीतने के बाद। जनता जब पूछतीं हैं वादे, तो सिर्फ गोल-गोल घूमाते है। " जियाउल हक जैतपुर सारण (बिहार)