Thursday, September 20

गजल

गजल

जियाऊल हक़

जियाऊल हक़

गजल
विधा - ग़ज़ल (गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर) """""""""""""""""""""""""""""""" कुर्सी के लिए वह अपनी आन बान शान बेच आया। सियासत के चक्कर में, वह अपनी ईमान बेच आया। ' जनता की सेवा करना तो एक बहाना था, उसका साहब। पा कर कुर्सी वह अपनी देश की पहचान बेच आया। ' आशा लगा कर लोग खड़े रहे सड़कों पर उसके लिए। और वह बन कर मसीहा सबका अरमान बेच आया। ' जिन गरीबों का मसीहा बना फिरता था, वह शख़्स। आज उन गरीबों का ही यह शख़्स मकान बेच आया। ' जिन लोगों ने अपनी कुर्बानी दी थी देश के खातिर। सात्ता के लालच में यह जिया उनकी सम्मान बेच आया। ' जियाउल हक जैतपुर सारण बिहार काव्य गौरव से सम्मानित राष्ट्रीय साहित्य सागर द्वारा।
जियाऊल हक़

जियाऊल हक़

गजल
भोजपुरी गजल............... ई शहरी मे कईसन कईसन लोग सखी। केहु हँसे, केहु रोये, ई कईसन संयोग सखी। ' हम ही खुद गम के मारऽल बानी ईहवा दोसरा के कईसे करी हम सहयोग सखी। , दुःख-दर्द के ई अंजान रहीया सन मे। बईठ के, के मनाई झुठ-मूठ के सोग सखी। , चार छः दिन के साथी बारे सब ईहवा। सुख-दुख सब मिलके ईहा भोग सखी। , हँसले, गाले, झूम झाम के जीले जीनगी। गुमनाम भईले बहुते जिया जईसन लोग सखी , जियाउल हक जैतपुर सारण बिहार पिन- 841205
डॉ० दिनेश त्रिपाठी “शम्स”

डॉ० दिनेश त्रिपाठी “शम्स”

गजल
ग़ज़लें..................... (1) न्याय की अवमानना पर गौर हो , अब हमारी प्रार्थना पर गौर हो | खिड़कियाँ अब सोच की मत बंद हों , हर नई संभावना पर गौर हो | आज तक 'जन ' को उपेक्षित ही किया , तंत्र की दुर्भावना पर गौर हो | दीनता बागी न हो जाए कहीं , वक़्त है हर याचना पर गौर हो | गीत जीवन के निरंतर गा रहा , 'शम्स' की इस साधना पर गौर हो | (2) मखमली अहसास बस जीवित रहे , प्यार का विश्वास बस जीवित रहे | चाँद-तारे सब मिलेंगे आपको , शर्त है आकाश बस जीवित रहे | जीतना या हारना मुद्दा नहीं , खेल का अभ्यास बस जीवित रहे | मारे जायेंगे असुर सारे मगर , राम का वनवास बस जीवित रहे | यक्ष प्रश्नों तक पहुँचने के लिए , है ज़रुरी प्यास बस जीवित रहे | खुद-ब-खुद पतझर सुखद हो जाएगा , दृष्टि में मधुमास बस जीवित रहे | 'शम्स' को मरने का डर बिलकुल नहीं , अन्त तक उल्लास बस जीवित रहे | (3)
के॰ पी० अनमोल

के॰ पी० अनमोल

गजल
ग़ज़ल--------------📝📝 क़ायदे सभी यूँ तो वर्दियाँ समझती हैं पर रसूख़दारों की धमकियाँ समझती हैं बेटियों को कुछ नज़रें ग़लतियाँ समझती हैं मोतियों की क़ीमत कब सीपियाँ समझती हैं पहले ख़ूब बिगड़ेगा फिर वही दुलारेगा आदतें समन्दर की कश्तियाँ समझती हैं किस तरह ज़माने से है अलग ज़रा-सा तू ये वुजूद की तेरे ख़ूबियाँ समझती हैं ख़ुद ही रखना होता है एहतियात हमको ही ज़िन्दगी के जोख़िम कब सेल्फ़ियाँ समझती हैं वार कितना तीखा था वासना की नज़रों का तार-तार आँचल की चिन्दियाँ समझती हैं भूख, प्यास, दुत्कारें, धूप और पसीना कब कार, बँगले, ए.सी. की मस्तियाँ समझती हैं ये धुआँ जमा होकर साँस-साँस में 'अनमोल' ज़ह्र कैसे घोलेगा चिमनियाँ समझती हैं   - के. पी. अनमोल शिक्षा - स्नातकोत्तर हिन्दी पद - वेब पत्रिका 'हस्ताक्षर' में प्रधान संपादक  
डॉ. दिनेश त्रिपाठी “शम्स”

डॉ. दिनेश त्रिपाठी “शम्स”

गजल
ग़ज़लें......................... (1) ये विषय है नहीं सिर्फ उपहास का , कुछ तो उपचार हो युग के संत्रास का | वृक्ष अब बाँटने लग गए धूप हैं , आजकल घोर संकट है विश्वास का | मैं हूँ तपती दुपहरी का नायक मुझे , व्यर्थ लालच न दें अपने मधुमास का | तृप्ति की याचना कैसे कर लूँ भला , मैं समर्थक रहा हूँ सदा प्यास का | डूबने लग गई वक़्त की नब्ज़ है , छोड़िये सिलसिला हास-परिहास का | आपने सिर्फ काटे मेरे पंख हैं , आँख में है अभी स्वप्न आकाश का | लेखनी कवि की सोई नहीं है अभी , दीप अब भी बुझा है नहीं आस का | (2) ख़्वाहिश-ए-दिल हज़ार बार मरे , पर न इक बार भी किरदार मरे | प्यार गुलशन करे है दोनो से , न तो गुल और न ही ख़ार मरे | चल पड़े तो किसी की जान मरे , न चले तो छुरी की धार मरे | ताप तन का उतर भी जाये मगर , कैसे मन पर चढ़ा बुखार मरे | ज़िन्दगी तू है अब तलक ज़िन्दा , म
जियाऊल हक़

जियाऊल हक़

गजल
गजल ------------------------------ मेरे दिल का कोई खरीदार नही। अकेलेपन में कोई प्यार नही। - जज्बात हुआ बेकाबू अब मेरा। मै मनचलो का कोई व्यापार नही। - प्रेम नगरी अब हड़ताल हुई है। जज्बातो का कोई संसार नही। - क्यों जख्म भरी कहानी बनाए। आसपास यारो की भरमार नही। - बेवफाई मे सब रोते हैं शायद। मैं दिवानों का कोई सरदार नही। - खोता नही किसी की चाहत मे यू। मुझे खोने का कोई आधार नही। - सुन लो जिया मेरी बात पलभर। तुम-सा यहाँ कोई गमखार नही। - जियाउल हक जैतपुर सारण बिहार
डॉ. दिनेश त्रिपाठी ‘शम्स’

डॉ. दिनेश त्रिपाठी ‘शम्स’

गजल
गज़लें डॉ. दिनेश त्रिपाठी ‘शम्स’📝📝  (1) हम नहीं डरते तिमिर के ज़ोर से,  अन्ततः हम जा मिलेंगे भोर से। आपकी निष्ठा अभी संदिग्ध है, सच बताएं आप हैं किस ओर से। हम चले आते हैं खिंचकर आप तक, हम बंधे हैं प्रीति वाली डोर से। लूटने को आ गए डाकू कई, मुक्ति हमको मिल गयी जब चोर से। मन के कोलाहल से बचने के लिए,  हम मिले हैं दुनिया भर के शोर से। वो हमें कब तक करेंगे अनसुना,  आइये हम और चीखें ज़ोर से। शम्स कुछ भी तो नहीं बोले मगर,  कह दिया सब कुछ नयन की कोर से।   (2) क्यों उपेक्षित हैं हमारी प्रार्थनाएं , देवता इस प्रश्न का उत्तर बताएँ | आपको उनसे निराशा ही मिलेगी , मत तलाशें इस कदर संभावनाएँ | लग गयी हैं स्वार्थ के झोकों से हिलने , सिर्फ खूंटी पर टंगी हैं आस्थाएँ | कुछ हमारे मौन का भी अर्थ समझें , हो नहीं पाती मुखर कुछ भावनाएँ | अब हमारे देश मे
रुद्र प्रताप सिंह “रुद्र”

रुद्र प्रताप सिंह “रुद्र”

गजल
📝📝 ____ग़ज़ल____📝📝   राम मिलते हैं अनुराग से! मैंने जाना किसी काग से!! (काग~ कागभुशुण्डि) राम के आगे माया कहाँ, कब समुन्दर ढ़का झाग से!! बान मूसल गदा से नहीं, कृश्न हारे हैं तो साग से!! (साग~ विदुर ने कृष्ण को साग खिलाया) भोग हो चाहे जितना बड़ा, है वो छोटा मगर त्याग से!! केंचुली की तरह जिस्म को, छोड़ना सीख ले नाग से!! माह-सी वो सिफ़त पा गया, जो जला इश्क़ की आग से!! (माह~ चाँद/ सिफ़त~ गुण) ~~रुद्र "रामिश"   रुद्र प्रताप सिंह "रुद्र" शोधछात्र - भोजपुरी अध्ययन केंद्र , B.H.U.