Tuesday, August 21

रुद्र प्रताप सिंह “रुद्र”

📝📝 ____ग़ज़ल____📝📝

 

राम मिलते हैं अनुराग से!
मैंने जाना किसी काग से!!

(काग~ कागभुशुण्डि)

राम के आगे माया कहाँ,
कब समुन्दर ढ़का झाग से!!

बान मूसल गदा से नहीं,
कृश्न हारे हैं तो साग से!!

(साग~ विदुर ने कृष्ण को साग खिलाया)

भोग हो चाहे जितना बड़ा,
है वो छोटा मगर त्याग से!!

केंचुली की तरह जिस्म को,
छोड़ना सीख ले नाग से!!

माह-सी वो सिफ़त पा गया,
जो जला इश्क़ की आग से!!

(माह~ चाँद/ सिफ़त~ गुण)

~~रुद्र “रामिश”

 

रुद्र प्रताप सिंह “रुद्र”

शोधछात्र – भोजपुरी अध्ययन केंद्र , B.H.U.

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