Tuesday, August 21

रत्नेश चंचल

 

हिन्दी दिवस पर युवा कवि रत्नेश चंचल का महत्वपूर्ण लेख ।📝📝📝📝📝📝

(निज भाषा उन्नति अहै)…………

हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं वो भी दे रहे हैं जिनके चौखट के भीतर हिन्दी को जाना उसी तरह मना है जैसे कुछ समय पहले दलितों को मंदिर में जाने पर प्रतिबंध था पर उनकी जरूरत समाज के सभी वर्गों को था,है और रहेगा । कुछ यही हाल आज हिन्दी का भी है,हम इस भाषा का प्रयोग केवल और केवल औपचारिक रूप से करते हैं और जैसे ही हमारी औपचारिकता पूरी होती है हम इसे दरकिनार कर देते हैं । हिन्दी की जो समझ होनी चाहिये हम उससे आज भी दूर हैं । आधुनिक युग में अंग्रेजी हमारे घर के कोने-कोने तक पांव पसार चुकी है और हम अंग्रेजीयत को स्वीकार चुके हैं । शहर से लेकर गांव तक कॉनवेंट स्कूल का बोलबाला है और हम चाहते हैं की हमारा बच्चा जन्म लेते ही हमारा अभिवादन अंग्रेजी में करे,वो अंग्रेजी में रोये और अंग्रेजी में हंसे तब हम छाती फूलाकर अपने को विकसित होने का दंभ भर सकें । टीवी,रेडियो, कम्प्यूटर,समाचार पत्र तक अंग्रेजी ही अंग्रेजी है यहां तक की हिन्दी फिल्मों में अंग्रेजी संवाद की अधिकता बढ़ी है और हिन्दी गीतों में भी अंग्रेजी के शब्द अपना अधिकार जमा चुके हैं पर ये हिंदी है की मिटने का नाम नहीं लेती बल्कि और मजबूती से दावेदारी करती रहती है । पूरी दुनिया में हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है जो अपने में तमाम भाषाओं को समाहित कर लेती है और उसे सम्मान देती है । हिन्दी का इतिहास बड़ा ही संघर्ष का रहा है एक लंबी चौड़ी कतार रही है हिन्दी लेखकों की जो अपना सर्वस्व लूटाकर हिन्दी को आगे किया और उसे शिखर तक पहुंचाया । हिन्दी को लेकर लोग आज भी असमंजस की स्थिति में रहते हैं पर हिंदी असमंजस में नहीं है वो सागर की तरह उमड़ रही है और अपनी लहरों से अपना परिचय दे रही है ।
आज के इस आधुनिक युग में भी हिन्दी अपना परचम लहरा रही है वो चाहे सोशल मीडिया हो या देश के प्रधानमंत्री का भाषण । हिन्दी विश्व के कोनें कोनें तक पहुंच चुकी है । जब हम फेसबुक खोलते हैं तो अधिकतर पोस्ट हिन्दी में देखकर गर्व महसूस करते हैं । जब अमेरिका और लंदन से हिन्दी भाषण का प्रसारण होता है तो सुकून मिलता है और हम अपनी भाषा पर इतराते और इठलाते हैं ।
हिन्दी को लेकर जो भ्रान्तियां हैं उसे समझने की जरूरत है । कुछ लोग बस दिखावे में आकर हिन्दी से दूर होना चाहते हैं पर हो नहीं पाते और ऐसे में हिन्दी को अछूत होने का दंश झेलना पड़ता है । हिन्दी पूर्वजों की गाढ़ी कमाई है,विरासत है, हिन्दुस्तान की पहचान है, भारतेन्दु, निराला,प्रसाद और तमाम साहित्यकारों की बलिदान गाथा है । देश की आजादी में इसका महत्वपूर्ण योगदान रहा है और इसका विराट स्वरूप आज भी बहुत कुछ बयां करता है । जरूरत है केवल इसे आत्मसात करने की ,समझने की,परखने की और जुबान व लेखनी से इसकी रक्षा करने की । आज भी सबसे अधिक लेखक,कवि और साहित्यिकार हिन्दी के हैं बस जरूरत है पाठकों की संख्या बढ़ाने की ताकि घर के कोने कोने तक हिन्दी का विस्तार हो और हम अपनी भाषा को मातृ रूप के सही मायने में स्थान दे सकें ।
हिन्दी दिवस को श्राद्ध के रूप में न मनाकर बल्कि इसे पूर्ण रूप से हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाय और नई पीढ़ी को हिन्दी से जोड़ा जाय ।
आप सभी हिन्दी प्रेमीयों को अनंत शुभकामनाएं…..।।।।।।

“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति कै मूल
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटै न हिय कै सूल।।
( भारतेन्दु हरिश्चंद्र )

(रत्नेश चंचल)
काशी
9335505793

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