Saturday, October 20

के॰ पी० अनमोल

ग़ज़ल————–📝📝

क़ायदे सभी यूँ तो वर्दियाँ समझती हैं
पर रसूख़दारों की धमकियाँ समझती हैं

बेटियों को कुछ नज़रें ग़लतियाँ समझती हैं
मोतियों की क़ीमत कब सीपियाँ समझती हैं

पहले ख़ूब बिगड़ेगा फिर वही दुलारेगा
आदतें समन्दर की कश्तियाँ समझती हैं

किस तरह ज़माने से है अलग ज़रा-सा तू
ये वुजूद की तेरे ख़ूबियाँ समझती हैं

ख़ुद ही रखना होता है एहतियात हमको ही
ज़िन्दगी के जोख़िम कब सेल्फ़ियाँ समझती हैं

वार कितना तीखा था वासना की नज़रों का
तार-तार आँचल की चिन्दियाँ समझती हैं

भूख, प्यास, दुत्कारें, धूप और पसीना कब
कार, बँगले, ए.सी. की मस्तियाँ समझती हैं

ये धुआँ जमा होकर साँस-साँस में ‘अनमोल’
ज़ह्र कैसे घोलेगा चिमनियाँ समझती हैं

 

– के. पी. अनमोल

शिक्षा – स्नातकोत्तर हिन्दी
पद – वेब पत्रिका ‘हस्ताक्षर’ में प्रधान संपादक

 

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