Tuesday, August 21

डॉ० दिनेश त्रिपाठी “शम्स”

ग़ज़लें…………………

(1)
न्याय की अवमानना पर गौर हो ,
अब हमारी प्रार्थना पर गौर हो |
खिड़कियाँ अब सोच की मत बंद हों ,
हर नई संभावना पर गौर हो |
आज तक ‘जन ‘ को उपेक्षित ही किया ,
तंत्र की दुर्भावना पर गौर हो |
दीनता बागी न हो जाए कहीं ,
वक़्त है हर याचना पर गौर हो |
गीत जीवन के निरंतर गा रहा ,
‘शम्स’ की इस साधना पर गौर हो |

(2)
मखमली अहसास बस जीवित रहे ,
प्यार का विश्वास बस जीवित रहे |
चाँद-तारे सब मिलेंगे आपको ,
शर्त है आकाश बस जीवित रहे |
जीतना या हारना मुद्दा नहीं ,
खेल का अभ्यास बस जीवित रहे |
मारे जायेंगे असुर सारे मगर ,
राम का वनवास बस जीवित रहे |
यक्ष प्रश्नों तक पहुँचने के लिए ,
है ज़रुरी प्यास बस जीवित रहे |
खुद-ब-खुद पतझर सुखद हो जाएगा ,
दृष्टि में मधुमास बस जीवित रहे |
‘शम्स’ को मरने का डर बिलकुल नहीं ,
अन्त तक उल्लास बस जीवित रहे |

(3)
नज़र खुद से मिलाने में पसीने छूट जाते हैं ,
खुदी को आजमाने में पसीने छूट जाते हैं |
हमारी मुस्कराहट से सभी को रश्क होता है ,
मगर यूँ मुस्कुराने में पसीने छूट जाते हैं |
मुहब्बत आपने कर ली ये अच्छी बात है लेकिन ,
मुहब्बत को निभाने में पसीने छूट जाते हैं |
हुनर को बेच लेने का हुनर आता नहीं सबको ,
मुनासिब दाम पाने में पसीने छूट जाते हैं |
फसल नफरत की पैदा कर रहे हैं अब सियासतदां ,
अमन के गुल उगाने में पसीने छूट जाते हैं |
पुरानी बात है जब आँच सच से दूर रहती थी ,
अभी सच को बचाने में पसीने छूट जाते हैं |
ये जो उम्मीद की लौ है इसे बुझने न दें यारो ,
अँधेरे को मिटाने में पसीने छूट जाते हैं |

(4)
दिल वहीं छोड़कर चले आये ,
रूठकर हाँ मगर चले आये |
हमको बाज़ार मुहँ चिढ़ाता था ,
जेब खाली थी, घर चले आये |
लोग झण्डों के साथ आये हैं ,
और हम ले के सर चले आये |
ख़्वाब आँखों में आये मुट्ठी भर ,
साथ में कितने डर चले आये |
अपनी मंज़िल तो ये नहीं लगती ,
हम ये आखिर किधर चले आये |
हम बुलाते रहे उन्हें लेकिन ,
कुछ अगर कुछ मगर चले आये |
ज़िन्दगी की कठिन परीक्षा में ,
शम्स पा के सिफ़र चले आये |

(5)
तल्ख़ रिश्ता सुधार लेते काश ,
बोझ दिल का उतार लेते काश |
तुमसे जब रूठकर चला था मैं ,
उस घड़ी तुम पुकार लेते काश |
ताप मन का उतर गया होता ,
इक नज़र तुम निहार लेते काश |
जो अँधेरा दिलों पे काबिज है ,
उस अँधेरे को मार लेते काश |
रफ्ता-रफ्ता गुजर गई आखिर ,
जिंदगी को संवार लेते काश |
ख़्वाब की इक हसीन दुनिया को ,
इस जमीं पर उतार लेते काश |
व्यस्त दुनिया सुधारने में हैं ,
‘शम्स’ खुद को सुधार लेते काश |

 

डॉ. दिनेश त्रिपाठी ‘शम्स’
वरिष्ठ प्रवक्ता: जवाहर नवोदय विद्यालय
ग्राम – घुघुलपुर , पोस्ट-देवरिया ,
जनपद- बलरामपुर , उ.प्र. -२७१२०१
मोबाइल-०९५५९३०४१३१
ईमेल–yogishams@yahoo.com

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