Saturday, October 20

जियाऊल हक़

विधा – ग़ज़ल
(गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर)
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कुर्सी के लिए वह अपनी आन बान शान बेच आया।
सियासत के चक्कर में, वह अपनी ईमान बेच आया।

जनता की सेवा करना तो एक बहाना था, उसका साहब।
पा कर कुर्सी वह अपनी देश की पहचान बेच आया।

आशा लगा कर लोग खड़े रहे सड़कों पर उसके लिए।
और वह बन कर मसीहा सबका अरमान बेच आया।

जिन गरीबों का मसीहा बना फिरता था, वह शख़्स।
आज उन गरीबों का ही यह शख़्स मकान बेच आया।

जिन लोगों ने अपनी कुर्बानी दी थी देश के खातिर।
सात्ता के लालच में यह जिया उनकी सम्मान बेच आया।

जियाउल हक
जैतपुर सारण बिहार
काव्य गौरव से सम्मानित राष्ट्रीय साहित्य सागर द्वारा।

One Comment

  • जियाउल हक

    सादर आभार आदरणीय।
    गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

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