Tuesday, August 21

सलिल सरोज

गर अपना ही चेहरा देखा होता आईने में………….

गर अपना ही चेहरा देखा होता आईने में
तो आज  हुई न होती मुरब्बत ज़माने में ।।1।।
गर मशाल थाम ली होती दौरे-वहशत में
तो कुछ तो वजन होता तुम्हारे बहाने में ।।2।।
जिसकी ग़ज़ल है वही आके फरमाए भी
वरना गलतियाँ हो जाती है ग़ज़ल सुनाने में ।।3।।
बाज़ार में आज वो नायाब चीज़ हो गए
सुना है मज़ा बहुत आता है उन्हें सताने में ।।4।।
रूठना भी तो ऐसा क्या रूठना किसी से
कि सारी साँस गुज़र जाए उन्हें मनाने में ।।5।।
एक उम्र लगी उनके दिल में घर बनाने में
अब एक उम्र और लगेगी उन्हें भुलाने में ।।6।।
दौलत ही सब खरीद सकता तो ठीक था
यहाँ ज़िंदगी चली जाती है इज़्ज़त कमाने में ।।7।।
वो आँखें मिलाता ही रहा पूरी महफ़िल में
देर तो हो गई मुझ से ही इश्क़ जताने में ।।8।।
जिधर देखो उधर ही बियाबां नज़र आता है
नदियाँ कहाँ अब मिल पाती हैं मुहाने में ।।9।।
गर बाप हो तो  जरूर समझ जाओगे कि
कितना दर्द होता है बच्चियाँ रुलाने में ।।10।।
जो गया यहाँ से  वो कभी लौटा ही नहीं
अब कौन मदद करे उजड़े गाँव को बसाने में ।।11।।
माँ तो पाल देती है अपनी सब ही संताने
पर बच्चे बिफ़र जाते हैं माँ को समझ पाने में ।।12।।
सलिल सरोज
B 302 तीसरी मंजिल
सिग्नेचर व्यू अपार्टमेंट
मुखर्जी नगर
नई दिल्ली-110009

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *