Tuesday, August 21

अमित मिश्रा

आंचलिक भाषा का एक महत्वपूर्ण लेख ………………………
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मिथिला के विवाह…….

मिथिलांचल में वैवाहिक रीति-रिवाज कनि अलग होइत ऐच्छ। ज्यादातर अपन-सभहक जीवन शैली स अपरिचित लोग के मिथिला के विवाह के विध–व्यवहार बेतुका और दीर्घावधि वला लगैत ऐच्छ। लेकिन ई सर्वविदित ऐच्छ की मैथिल दम्पतिं में जे पारस्परिक प्रेम भाव होइत ऐच्छ, एक दोसर के प्रति जे सम्मान के भावना होइत ऐच्छ, से गौर करे वला बात ऐच्छ। कखनो कखनो त एकदम बेमेल विवाह सेहो सफल भ जाइत ऐच्छ।
सबसे पहीले वर जखन वधु के द्वार पर आबैत छैथ त वर के सब के समक्ष अपन वस्त्र बदले परैत ऐच्छ ताकि वर के कोनो शारीरिक दोष त नई छैन? तहन विधकरी(एकटा अनुभवी महिला जही पर सबटा विधि–व्यवहार करबाबई के जिम्मा होइत ऐच्छ) द्वारा परिछन के दौरान हुनका स गृह्स्त जीवन के व्यवहारिक प्रश्न पुच्छल जाइत ऐच्छ।

फेर कोहबर में नैना -जोगिन, जिहिमे भावी पत्नी और साली के बिना देखले एक के चुनई के रहैत ऐच्छ। अहिमे लोके सबके बहुत मनोरंजन होइत ऐच्छ साथ में वर के पारखी नजर समझ में आबैत ऐच्छ।
ओहि के बाद समाज परिवारके बुजुर्ग सब के साथ मिल क ओठंगर कुटल जाइत ऐच्छ यानि पुरा समाज के स्वीकृति के साथ गृहस्त जीवन में प्रवेश के अनुमति।
चाहे ओठंगर कूटनाई हो या भाई के साथ मिल क धान के लावा छीटनाई, ई सब रिवाज के पीछे कोनो न कोनो व्यवहारिकतर्क होईत ऐच्छ।
फेर आम के कांच लकड़िं के प्रज्वलित क के ओहिके समक्ष मन्त्र द्वारा विवाह संपन्न करवायल जाइत ऐच्छ ओहे अग्नि पर ओठंगर में कुटल धान के चावल स वर खीर बनायल जाइत ऐच्छ अर्थात गृहस्तथी में पूर्ण सहयोग क तैयारी।
वधु के प्रथम सिंदूर दान अलग सिंदूर( भुसना) स कइल जाइत ऐच्छ! अहि विवाह के बाद वर–वधु कोहबर (वर –वधू के कमरा ) में जाइत छैथ। कोहबर के चित्र द्वारा सजायल जाइत ऐच्छ। जिहीमे सांकेतिक रूप में गृहस्त जीवन के महत्व के दिखायल जाईत ऐच्छ।
अहि दिन सुहाग शैया नई सजायल जाइत ऐच्छ बल्कि जमीन पर सुतई के व्यवस्था होइत ऐच्छ। कोहबर में विधकरी वघू के ल क आबैत छैथ और वर–वधु के झिझक के तोड़ई के माध्यम बनैत छैथ।
अगला तीन दिन तक इहे क्रम चलइत ऐच्छ,अहि तीन दिन के दौरान वर–वधु के भोजन में नमक नहीं खुआयल जाइत ऐच्छ, ताकि इन्द्रियां शिथिल रहइ।
रस्म के दौर पूरा दिन चलइत रहइत ऐच्छ। वर –वधु एक दोसर के भली–भांति समईझ लैत छैथ।
हाँ, बाराती गण वर के छोईड़ क वापस चैल जाइत छैथ।असल विवाह चौथा दिन पुनः होईत अइछ। अगर कन्या अपरिपक्व होई त, वर कुछ दिन ससुराले में रही जाइत छैथ ताकि कन्या के अंचिन्हार माहौल में ढले में असुविधा नई होई। कखनो कखनो त सालभर या ओहि स ज्यादा दिन तक लड़की मायके में रहई छैथ। अहि दौरान साल भईर हर तीज–त्यौहार में लड़की के लेल सौगात आबैत रहैत ऐच्छ।
अंत में सुविधानुसार कन्या के विदाई होइत ऐच्छ,जकरा द्विरागमन कहइत छि।
अहि पूरा आयोजन में गौर करई वाला बात ऐच्छ,समाज में परिवार के महत्व, परिवार अगर संस्कारी रहत त कन्या भी संस्कार वाली होयत,ऐता उपरी सुन्दरता स अधिक, सुन्दरसंस्कार के देखल जाईत ऐच्छ कियाकि स्त्रीये परिवार के संस्कार देइत छैथ।
मिथिलांचल में महिला के काफी महत्व देल जाइत ऐच्छ।

मैथिल विवाह के मूल स्वरूप इहे ऐच्छ। हाँ आब लोक अपन सुविधानुसार फेर बदल क क विवाह संपन्न करवावेत छैथ।

जय मिथिला।

 

:-अमित मिश्रा

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