Thursday, September 20

निखिल तिवारी

देखो कितना परेशान है ज़िंदग़ी………..

कभी खुशी तो कभी
आंशु का गुलाम है ज़िन्दगी
देखो कितना परेशान है ज़िंदग़ी ।

कभी अपनो को मनाने में
तो कभी सपनो को सजाने में
कितना बेवस लाचार है ज़िंदगी
देखो कितना परेशान है ज़िन्दगी ।

कभी धूप कभी छाया में
कभी सत्य कभी माया में
अपनो की धक्कों से लाचार है जिंदगी
देखो कितना परेशान है जिंदगी ।

महफ़िलो में नज़र नही आती है
तन्हाई में दुश्मन बन जाती है
कभी जी भर के हँसाती है ज़िन्दगी
तो कभी जी भर के रुलाती है ज़िंदगी
देखो कितना परेशान है जिंदगी ।

किसी के अहंकार का ताज है
तो किसी की दो रोटी का मोहताज़ है ज़िन्दगी
किसी की अपनो के ठोकरों से रुलाती है
तो किसी ने अपनो की उम्मीदों से सजाया है जिंदगी
देखो कितना परेशान है जिंदगी ।

निखिल तिवारी
रामपुर,सैयदराजा
चंदौली (उ0 प्र0)

4 Comments

  • अविनाश पांचाल

    बहुत खूब भाई
    आपकी पहली कविता के लिए बहुत बहुत बधाई
    आपने उस कविता के माध्यम से ज़िन्दगी की सच्चाई को बयां किया।
    बहुत बहुत शुभकामनाएं

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