Thursday, September 20

जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

. मन भीतरि समाइल ———————–


अचके छोड़ि पराइल ई मूढ़ मतिया।
मन भीतरि समाइल माहुर बतिया।
साँझ बेवा नीयन लोर छलका गइल
भाव भंगुआइल, छाव बसिया गइल
भोरे कूंहुकल करेज फटल छतिया।
मन भीतरि समाइल माहुर बतिया।
रउंदल मनवा से गफलत मे जीयल
मउरल जिनगी के सुधिया से सीयल
बहुरल ना तबहूँ बिरहिन के रतिया।
मन भीतरि समाइल माहुर बतिया।
मनवा क पिरिया सुनुगे आ धधके
चितवन बिसारी जस अदहन खदके
कबहूँ न संवरी छितिराइल थतिया।
मन भीतरि समाइल माहुर बतिया।

• जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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