Wednesday, November 21

अजीत मालवीया “ललित”

 

|| अपरिपक्व शिक्षक ||…………….

शिक्षक सभी पदों में महत्वपूर्ण पद होता है लेकिन शिक्षक जब से व्यापारी हुआ है, तब से शिक्षा का मूल्य भी काफी हद तक गिर गया है। जब से शिक्षक व्यापारी हुआ है, तब से शिक्षा केवल नाम की ही रह गई है। शिक्षक जब से व्यापारी हुआ है, तब से उसने विद्यार्थी को समझना ही बंद कर दिया है। वह केवल अपनी धुन में रम्य स्वयं को पुरोहित समझ रहे है।

          यह जानते हुए भी कि आज जो मैं मैं लिख रहा हूं वह भी एक शिक्षक की बदौलत ही है, किंतु जो सत्य है उसे अधिक समय तक दबाकर नहीं रखा जा सकता या यूं कहूं कि वह स्वयं ही अधिक समय तक दबकर नहीं रह सकता है और इसका मुख्य कारण यह है कि जो पुराने शिक्षक थे या हैं उनसे नए शिक्षकों की तुलना करने पर पुराने ही भारी पड़ते हैं।

यह जानते हुए भी कि जमाना हाईटेक हो गया है, सभी को वर्तमान परिस्थिति में ढल जाना चाहिए किंतु क्या है ना कि कुछ विद्यार्थी ऐसे भी होते हैं,जो हाईटेक जमाने को अंगीकार नहीं कर पाते इस परिस्थिति में चाहिए कि उनको उनके हिसाब के शिक्षक मिले जो कि उपयुक्त तरीके से उन्हें गढ़ सकें परंतु वर्तमान शिक्षा की पद्धति जितनी ऊंची हुई है वास्तविक तौर पर वह उतनी ही घटिया हुई है वह जिसका परम योगदान जाता है व्यापारी शिक्षकों को।

मैं यह नहीं कहता कि शिक्षा के संग व्यापार कदापि ना करो किंतु उचित मात्रा में करो अन्यथा यही शिक्षा पद्धति देश के सर्वनाश का कारण बनेगी,करीब से आंकलन करने पर ज्ञात होता है कि जो आज के नए युवा शिक्षक हैं उनमें शिक्षक बनने लायक काबिलियत ही नहीं है या सीधे शब्दों में कहूं तो वह शिक्षक बनने के लायक ही नहीं हैं, कारण है उनकी अल्प समझ व खोखली मानसिक स्थिति, इस तरह की अल्प समझ इन शिक्षकों की मानसिकता मैं इस तरह घर कर गई है कि वह उससे उभर ही नहीं पा रहे हैं और इसका श्रेय जाता है मोबाइल नामक यंत्र को और बाकी का श्रेय जाता है उनकी परवरिश को जो कि बचपन में हुई है।
जिस तरह इस प्रकार के शिक्षक, शिक्षा को कूड़ा करकट बनाने पर तुले हैं इसका असर आज नहीं तो कल सभी को भुगतना होगा।
शिक्षकों का पद कोई सामान्य पद नहीं है ।।
भले ही पैसों के मामले में इसकी कम अहमियत हो किंतु वास्तविक तौर पर यदि आंकलन किया जावे तो शिक्षक वह पद है जो इस संसार की गरिमा है विद्यार्थी की मानसिकता को गढ़ने का कार्य एक शिक्षक का है, और वही विद्यार्थी आगे क्या कर जाए इसका श्रेय शिक्षक का है।

संज्ञान में लेने कि बात यह है कि जिस तरह की मानसिकता जिस शिक्षक में होगी वह उसी प्रकार की मानसिकता को विद्यार्थी में विकसित करेगा लेकिन आज के शिक्षक की मानसिकता बड़ी दुरूह और निम्न कोटि की है, जिसे मैं अपरिपक्व शिक्षक कहता हूं वह यही है।
विद्यार्थी को समझने की क्षमता आज के शिक्षक में बिल्कुल भी नहीं है और न ही उनका रवैया शिक्षक बनने लायक  है।

••अपरिपक्व शिक्षक•• मैंने ऐसा क्यों कहा?

हमने पढ़ा भी है और सुना भी है कि प्राचीन काल में छोटे से छोटे बच्चों की बात को बड़ी गंभीरता से सुना जाता था, और उनकी प्रतिभा को समझा जाता था और यह दायित्व मां-बाप से ज्यादा एक शिक्षक का होता था क्योंकि वह शिक्षक ही है जो विद्यार्थी की प्रतिभा को समझकर उस में निखार ला सकता है, और उसकी प्रतिभा के अनुसार गढ़ सकता है समाज के लिए उस विद्यार्थी को परिपक्व कर सकता है।

आज की मनोदशा इस प्रकार से बदली है कि शिक्षक उस प्रतिभा को निखारना तो दूर की बात है वरन उसका मजाक बनाकर रख दिया है, परंतु विद्यार्थी असक्षम होने के कारण उसका कोई विरोध भी नहीं कर पा रहा है,किंतु यह बात शिक्षक को समझना बिल्कुल नहीं आ रही है कि किस प्रकार किसी के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहा है और शिक्षक की विद्यार्थी को ना समझने की उस को गंभीरता से ना लेने की आदत को मैं अपरिपक्व शिक्षक कह रहा हूं क्योंकि शिक्षक तो वृहद हृदय वाला होता है।

विद्यार्थी के कदमों को स्वयं के कदमों के सापेक्ष लाकर उसे बढते ही जाने की सीख देने वाला होता है किंतु आज परिस्थिति बड़ी विपरीत है जो कि इस तरह की शिक्षकों का निर्माण नहीं कर रही है अपितु कुछ मजाक तुल्य लोगों को बना रही है जो कि शिक्षा का मजाक बना रहे हैं, वास्तविक तौर पर यह किसी शिक्षक के ऊपर कटाक्ष नहीं है।

अपितु यह कटाक्ष उनको है जो कि धोखे से शिक्षक जैसे गरिमामय पद पर आ बैठे हैं और सच्चे अर्थों में वे शिक्षक ही नहीं हैं क्योंकि शिक्षक की परिभाषा ही कुछ और है उस पर जो खरा उतरता है वही शिक्षक हैं।

              शिक्षक में गंभीरता होती है। परखने की क्षमता होती है, प्रत्येक विद्यार्थी को रग रग से निरीक्षण करने का अद्भुत अनुभव होता है,और यही सद्गुण सच्चे अर्थों में उसे शिक्षक का दर्जा देते हैं।

-अजीत मालवीया’ललित’

    गाडरवारा,मध्यप्रदेश

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