Tuesday, August 21

Author: Dhirendra Panchal

रत्नेश चंचल

रत्नेश चंचल

कविताएं
तेरे शहर में आने को जी चाहता है फिर से नजरें मिलाने को जी चाहता है । जो बातें रह गयी अब तक अधुरी बैठकर सब बताने को जी चाहता है । हम दोनों का अब भी हरा जख्म है उसपे मरहम लगाने को जी चाहता है । जानता हूं की हमसे तुम्हें रंजो गम है सच कहूं तो मनाने को जी चाहता है । जिस गली से है होता गुजरना तेरा उस गली आने जाने को जी चाहता है । ये चंचल निगाहें तड़पती बहुत हैं प्यास इनकी बुझाने को जी चाहता है ।। रत्नेश चंचल वाराणसी संपर्क-9335505793
रत्नेश चंचल

रत्नेश चंचल

कविताएं
घेर बदरीया रिमझिम रिमझिम बरसे लागल पानी धरती ओढ़ के मगन भइल बा फिर से चुनरीया धानीं त अंखीया जुड़ हो जाले देख के सिवनवां में मन धधाइल बाटे सबकर सवनवां में । रोपत धान में किआरी में रोपनी के गीत सुनाता बरम बाबा तर झुलाआ लागल कजरी रोज गवाता भिंजें बाल बुतुरुआ खेलत के अंगनवां में मन धधाइल बाटे सबकर सवनवां में । हरिअर भइल बगइचा देख लाठ डांड़ हरिआइल बा सुखल रहे जे नदीया ओह में ललका पानी आइल बा त होला खेल छुअंता धरती असमनवां में मन धधाइल बाटे सबकर सवनवां में । रत्नेश चंचल वाराणसी 9335505793
कवि चन्द्रशेखर मिश्र जी

कवि चन्द्रशेखर मिश्र जी

कविताएं
  बस में सफर करते हुए हमारे आदर्श कवि चंद्रशेखर मिश्र जी के हृदय को एक मूंगफली बेच रहे अबोध बालक , जिसके साथ एक महोदय ने बद्तमीजी की थी, आघात पहुंचा और उनकी कलम चल पड़ी । 【उस अबोध बालक का दर्द देखिये कैसे व्यक्त करता है 】 👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇 पुस्तकों का बोझ लेकर चलने की उमर में चिनिया बदाम बेचने को चल देते हैं । दूध भात खाने का तो स्वप्न भी न देखा कभी गालियों झिड़कियों से पेट भर लेते हैं । बच्चा कहता है..........कि👇👇👇👇 धक्का मत दीजिये, खरीद लीजिये हुजूर भारत के नाते हम आपही के बेटे हैं धक्का मत दीजिये, खरीद लीजिये हुजूर भारत के नाते हम आपही के बेटे हैं पर गर्व हमें है कि हम मूंगफली बेचते हैं सुनता हूँ बड़े लोग देश बेच देते हैं ।। कव
Editor [ सम्पादक ]

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संम्पर्क
सम्पादक - इं. धीरेन्द्र पांचाल पता - ग्राम + पोस्ट ~ भीषमपुर          तहसील ~ चकिया         जिला ~ चन्दौली U.P. ईमेल - dhirendra8896@gmail.com मो. न. - 8853853120  Education - Diploma + B.tech.
योगेन्द्र शर्मा “योगी”

योगेन्द्र शर्मा “योगी”

कविताएं
आतंकी हमले में जान गवानें वाले अमरनाथ भक्तों को समर्पित मेरी एक रचना.........!👏👏 गोली थी दहशतगर्दों की लेकिन घाव सियासी हैं अमरनाथ के भक्तों पर हमलावर कौन जेहादी हैं। मौन अभी तक जो हैं सेकुलर वो भी तो अपराधी हैं हर घटना पर निंदा केवल लगती कायर छाती है। आतंकी का धरम नहीं यह बातें कहाँ से आती हैं लेकर पत्थर भींड़ जो उमड़ी उनकी जात बताती है। हमदर्दी का चोला ओढ़े सत्ता लाश उठाती है देकर चंद खनकते सिक्के अवसर सिरफ़ भुनाती है। तुष्टिकरण की गीतें बेजां हर बार कलम जो गाती है सुख गई है स्याही उसकी या बेशर्म लजाती है। जो पुरस्कार लौटाये थे क्या ? उनको लज्जा आती है संकोच नहीं "योगी" कहता वे घर के अंदर घाती हैं। गोली थी दहशतगर्दों की लेकिन घाव सियासी है।।"योगी"
रामजियावन दास “बावला” जी

रामजियावन दास “बावला” जी

कविताएं
​देश भइल आजाद मगर रण के बरबादी पउलस के सोचा आजादी पउलस के..... ? के के आपन खून बहावल के आपन सर्वस्व लुटावल केकर लड़िका बनें कलक्टर, इ ओस्तादी पउलस के सोचा आजादी पउलस के...?  केकरे आह से पर्वत टूटल शिव ब्रम्हा के आसन छूटल के योगी बन अलख जगवलस पर परसादी पउलस के सोचा आजादी पउलस के....?