Tuesday, August 21

Author: Dhirendra Panchal

शम्भू नाथ शर्मा “दरदी “

शम्भू नाथ शर्मा “दरदी “

कविताएं
  गीत क्या है......... व्यथा ही गीत बनती है , व्यथा संगीत बनती है , व्यथा गाथा करुण स्वर में हो , कोकिल गीत बनती है | शम्भू नाथ शर्मा "दरदी " भीषमपुर ,चकिया ,चन्दौली , u.p.
सलिल सरोज

सलिल सरोज

कविताएं
गर अपना ही चेहरा देखा होता आईने में............. गर अपना ही चेहरा देखा होता आईने में तो आज  हुई न होती मुरब्बत ज़माने में ।।1।। गर मशाल थाम ली होती दौरे-वहशत में तो कुछ तो वजन होता तुम्हारे बहाने में ।।2।। जिसकी ग़ज़ल है वही आके फरमाए भी वरना गलतियाँ हो जाती है ग़ज़ल सुनाने में ।।3।। बाज़ार में आज वो नायाब चीज़ हो गए सुना है मज़ा बहुत आता है उन्हें सताने में ।।4।। रूठना भी तो ऐसा क्या रूठना किसी से कि सारी साँस गुज़र जाए उन्हें मनाने में ।।5।। एक उम्र लगी उनके दिल में घर बनाने में अब एक उम्र और लगेगी उन्हें भुलाने में ।।6।। दौलत ही सब खरीद सकता तो ठीक था यहाँ ज़िंदगी चली जाती है इज़्ज़त कमाने में ।।7।। वो आँखें मिलाता ही रहा पूरी महफ़िल में देर तो हो गई मुझ से ही इश्क़ जताने में ।।8।। जिधर देखो उधर ही बियाबां नज़र आता है नदियाँ कहाँ अब मिल पाती हैं मुहाने में ।।9।। गर बाप हो तो  जरूर
रत्नेश चंचल

रत्नेश चंचल

शायरी
शायरी............ (1) वो शख्स इस कदर घबरा रहा है हर बार अपने आप को डरा रहा है जो अब तक समझ नहीं पाया वो वही बात बार बार  समझा रहा है । (2) उनके मुहब्बत का मैं आज तलक कर्जदार हूं दुख इस बात का है कि उनके नजर में गद्दार हूं । (3) दिल के मामले में दिमाग लगाना अच्छा नहीं लगता बेवाहीयात बातों से बरगलाना अच्छा नहीं लगता वो बड़े गुमान में है जिसके पैरों तले जमीन नहीं वैसे शख्स के यहां आना जाना अच्छा नहीं लगता। (4) वो सत्यवादी था अब झूठ बोलता है                लंका में खड़ा होकर उसे बैकुंठ बोलता है ।। (5)                                                                 चर्चा है बहुत उनकी बड़े मशहूर लगते हैं            इसी खयाल में डुबकर बड़े मगरुर लगते हैं          हमें भी थी बड़ी हसरत दीदार कि उनके           उनसे मिलकर मैं पाया बड़े मजबूर लगते हैं ।              
बन्धू पाल “बन्धू”

बन्धू पाल “बन्धू”

कविताएं
बावला जी पर एक छन्द..... सोच दाहिन बाँव नाहीं,कवनो दुराव नाहीं,भाव से भरल भण्डार बावला जी ,                             विविध विधा क सर्वज्ञ मर्मज्ञ रहैं,भोजपुरी माटी क श्रींगार बावला जी। भोजपुरी भेष- भुषा कुलियै लगाव रहै, कविता कला क चमत्कार बावला जी,                         पुरा पूर्वांचल में डंका बजाय गइलैं, भीषमपुर गाँव क हमार बावला जी ।।                         कवि- बन्धू पाल “बन्धू”                         पता-भीषमपुर, चकिया,चन्दौली
योगेन्द्र शर्मा “योगी”

योगेन्द्र शर्मा “योगी”

शायरी
शायरी.....🚩🚩🚩🚩 रौंद कर पैरों तले जो ख्वाब सारे मल दिये, वो कातिल कहाँ कोई गैर थे जो कत्ल करके चल दिये।।   युवा कवि- योगेन्द्र शर्मा “योगी” ग्राम- भीषमपुर,चकिया, चन्दौली
रवि सिंह

रवि सिंह

कहानी
"कन्यादान_के_अधिकार......... पूरा बीस साल बाद मंजू आपन बेटी शिवानी के लेके गाँवे आईल रहली।घर के कोना-कोना से उनकर ईयाद जुडल रहे।आँगना,दुवार,तुलसी-चौड़ा,ईनार,निम के गाछ सब मंजू के बीस बरिष पहिले के जिनगी ईयाद दिवावत रहे।केतना सुंदर हसत-खेलत परिवार रहे,सब केहू आँख में बसा के राखे नवकी दुलहिन के बाकिर उ रात उनका खातिर कवनो अमावस के रात से कम ना रहे,उनका हसत-खेलत जिनगी के आपन कालिख से तोप दिेहलस।उ तूफान भरल रात आ अचानक उठल छाती के दर्द उनका पति के हमेशा खातिर उनका से छीन लिहलस आ इहाँ से उनकर जिनगी आपन दोसरका रूप देखावे लागल। काल्ह ले जे दुल्हिन आँखि के पुतरी नियन रहली अब बस एगो अभागिन विधवा होके रह गईल रहली।घर के लोग अंधविश्वास में बेसी भरोसा करत रहे लोग।सब केहू के ब्यवहार बदले लागल रहे।अब त निमन काम पर जाए के बेरा लोग उनकर मुँह भी देखल ना चाहे।हर काम मे शुभ-अशुभ देखाए लागल।जवन घर मे उ आ
कविताएं
""" असलियत नेता जी के """ झूठ की जमा पहन कर यह अपनी कुर्सी बचाते हैं। असली नेता का हैं यहीं पेशा की अपनी हुकूमत जमाते हैं। ' निवाला छीन कर जनता की ख़ुद की महल बनाना हैं। और ध्यान भटकाने के लिए शहरों में दंगे कराते हैं। ' इनके के डर से लोग चुप्पियाँ साध लेते हैं हर वक़्त। चुप्पियाँ साधने का मतलब इनकी हम हौसला बढ़ाते हैं। ' खिलाफ इनकी जो आवाज उठाने की कोशिश करते हैं। अपनी पैसे और दम-बूते पर उनकी आवाज दबाते हैं। ' वादा किये हुए बातों को भूल जाते है जीतने के बाद। जनता जब पूछतीं हैं वादे, तो सिर्फ गोल-गोल घूमाते है। " जियाउल हक जैतपुर सारण (बिहार)
योगेन्द्र शर्मा “योगी”

योगेन्द्र शर्मा “योगी”

कविताएं
सबही से कमज़ोर लगी ला....... घरे बहरे पास पड़ोसी सबही से कमजोर लगी ला हँसी देख के हमे लजाले खुशी के अंखिया लोर लगी ला बिना गूँन कै अवगुन भरले बिन पाखी कै मोर लगी ला अपने धुन में नाचत गवात बिना सॉज के शोर लगी ला फटल खलित्ता लेहले "योगी" बिन पइसा कै चोर लगी ला। घरे बहरे पास पड़ोसी सबही से कमजोर लगी ला।।"योगी" योगेन्द्र शर्मा "योगी" भीषमपुर,चकिया, चन्दौली (उ.प्र.)
रवि सिंह

रवि सिंह

कहानी
बाबूजी ______________ बाबूजी बड़ा मिलनसार स्वभाव के निमन आदमी रहले। गावँ के लोग के सुख-दुुख खातिर हमेशा आगा रहस उनका येही स्वभाव के कारन लईका से सेयान सब केहू उनका बाबूजी कहे।राकेश आ रागिनी दुगो संतान रहे बाबूजी के। बाकी लईका आ लईकी में कवनो फरक ना कइनी बाबूजी। दुनु के पढ़े खातिर पानी नियन पईसा बहवनी।बेटा पढ़- लिख के इंजीनियर भईले बाकी इंजीनियर भईला के बाद भी नॉकरी मुश्किल रहे ,बाबूजी ले दे के नॉकरी भी करवा दिहनी।राकेश के जल्दिये पटना में नॉकरी लाग गईल आ लगले एगो पढ़ल- लिखल लईकी देख के बेटा के बियाह भी क दिहनी।अब बाँच गईली रागिनी, बाबूजी उनको के पढ़ा-लिखा के वकील बना दिहनी आ तबहुँ जब मन के संतोष ना भईल त निमन घर देख के खूब दहेज देके भारी घर मे बेटि के बियाह क दिहनी।अब दुनु जाना आपना जिंदगी में खुश रहे लोग आ बाबूजी राकेश के माई के संगे गाँवे रहस। राकेश जड़िये से एक नंबर के मलेक्ष रहले।प
जियाऊल हक़

जियाऊल हक़

गजल
विधा - ग़ज़ल (गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर) """""""""""""""""""""""""""""""" कुर्सी के लिए वह अपनी आन बान शान बेच आया। सियासत के चक्कर में, वह अपनी ईमान बेच आया। ' जनता की सेवा करना तो एक बहाना था, उसका साहब। पा कर कुर्सी वह अपनी देश की पहचान बेच आया। ' आशा लगा कर लोग खड़े रहे सड़कों पर उसके लिए। और वह बन कर मसीहा सबका अरमान बेच आया। ' जिन गरीबों का मसीहा बना फिरता था, वह शख़्स। आज उन गरीबों का ही यह शख़्स मकान बेच आया। ' जिन लोगों ने अपनी कुर्बानी दी थी देश के खातिर। सात्ता के लालच में यह जिया उनकी सम्मान बेच आया। ' जियाउल हक जैतपुर सारण बिहार काव्य गौरव से सम्मानित राष्ट्रीय साहित्य सागर द्वारा।