Saturday, October 20

कविताएं

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सलिल सरोज

सलिल सरोज

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गर अपना ही चेहरा देखा होता आईने में............. गर अपना ही चेहरा देखा होता आईने में तो आज  हुई न होती मुरब्बत ज़माने में ।।1।। गर मशाल थाम ली होती दौरे-वहशत में तो कुछ तो वजन होता तुम्हारे बहाने में ।।2।। जिसकी ग़ज़ल है वही आके फरमाए भी वरना गलतियाँ हो जाती है ग़ज़ल सुनाने में ।।3।। बाज़ार में आज वो नायाब चीज़ हो गए सुना है मज़ा बहुत आता है उन्हें सताने में ।।4।। रूठना भी तो ऐसा क्या रूठना किसी से कि सारी साँस गुज़र जाए उन्हें मनाने में ।।5।। एक उम्र लगी उनके दिल में घर बनाने में अब एक उम्र और लगेगी उन्हें भुलाने में ।।6।। दौलत ही सब खरीद सकता तो ठीक था यहाँ ज़िंदगी चली जाती है इज़्ज़त कमाने में ।।7।। वो आँखें मिलाता ही रहा पूरी महफ़िल में देर तो हो गई मुझ से ही इश्क़ जताने में ।।8।। जिधर देखो उधर ही बियाबां नज़र आता है नदियाँ कहाँ अब मिल पाती हैं मुहाने में ।।9।। गर बाप हो तो  जरूर
बन्धू पाल “बन्धू”

बन्धू पाल “बन्धू”

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बावला जी पर एक छन्द..... सोच दाहिन बाँव नाहीं,कवनो दुराव नाहीं,भाव से भरल भण्डार बावला जी ,                             विविध विधा क सर्वज्ञ मर्मज्ञ रहैं,भोजपुरी माटी क श्रींगार बावला जी। भोजपुरी भेष- भुषा कुलियै लगाव रहै, कविता कला क चमत्कार बावला जी,                         पुरा पूर्वांचल में डंका बजाय गइलैं, भीषमपुर गाँव क हमार बावला जी ।।                         कवि- बन्धू पाल “बन्धू”                         पता-भीषमपुर, चकिया,चन्दौली
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""" असलियत नेता जी के """ झूठ की जमा पहन कर यह अपनी कुर्सी बचाते हैं। असली नेता का हैं यहीं पेशा की अपनी हुकूमत जमाते हैं। ' निवाला छीन कर जनता की ख़ुद की महल बनाना हैं। और ध्यान भटकाने के लिए शहरों में दंगे कराते हैं। ' इनके के डर से लोग चुप्पियाँ साध लेते हैं हर वक़्त। चुप्पियाँ साधने का मतलब इनकी हम हौसला बढ़ाते हैं। ' खिलाफ इनकी जो आवाज उठाने की कोशिश करते हैं। अपनी पैसे और दम-बूते पर उनकी आवाज दबाते हैं। ' वादा किये हुए बातों को भूल जाते है जीतने के बाद। जनता जब पूछतीं हैं वादे, तो सिर्फ गोल-गोल घूमाते है। " जियाउल हक जैतपुर सारण (बिहार)
योगेन्द्र शर्मा “योगी”

योगेन्द्र शर्मा “योगी”

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सबही से कमज़ोर लगी ला....... घरे बहरे पास पड़ोसी सबही से कमजोर लगी ला हँसी देख के हमे लजाले खुशी के अंखिया लोर लगी ला बिना गूँन कै अवगुन भरले बिन पाखी कै मोर लगी ला अपने धुन में नाचत गवात बिना सॉज के शोर लगी ला फटल खलित्ता लेहले "योगी" बिन पइसा कै चोर लगी ला। घरे बहरे पास पड़ोसी सबही से कमजोर लगी ला।।"योगी" योगेन्द्र शर्मा "योगी" भीषमपुर,चकिया, चन्दौली (उ.प्र.)
योगेन्द्र शर्मा “योगी”

योगेन्द्र शर्मा “योगी”

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# न्याय के रखवाले भी अब तो....... न्याय के रखवाले भी अब तो राजनीति में उतर गये है खादी कीड़े जैसे लगता इनके मन को कुतर गये हैं। भींग गई आखों की पट्टी अन्तःमन तक सिहर गये हैं जो अब तक गूँगे लगते थे वे भी अब तो मुखर गये हैं। लोकतंत्र को खतरा कह कर वे भी नाहक चिहर रहे हैं जो भी अब तक बने मुखौटे काश्मीर पर बदल रहे हैं। जरा याद वह दौर करो तुम जब कर्नल को जेल हुई थी हिरन शिकारी की इज्जत से इसी देश में वेल हुई थी। क्या जमीर तेरा सोया था जब इशरत पर रोये थे चारा खाने वाले के घर बेच के इज्जत सोये थे। दहक उठी जब नगर मुंबई क्या तुमने कुछ सोचा था आशाओं पर देश के तुमनें कैसे पानी फेरा था। जो सारी सीमा लांघ गई अफजल के पैरोकारी में वही सियासत आज यहाँ क्यूँ लिपटी है मक्कारी में। अब संविधान का लेप लगा वे सारे चेहरे निखर गये हैं "योगी" जो भी कुलभूषण पर दिल से अ
योगेन्द्र शर्मा “योगी”

योगेन्द्र शर्मा “योगी”

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हे लोकतंत्र के भाग्य विधाता....... हे लोकतंत्र के भाग्य विधाता खद्दरधारी झूठी आशा डाकू चोर प्रकट होई जाता जब सुनता है तेरी भाषा चोर उचक्कों के हो भ्राता भ्र्ष्टाचार है तेरी माता सांप छूछून्दर पर है भारी जनता से यह तेरी यारी देख तुझे लज्जा शर्माए बेशर्मी मुँहफट बतियाये चारा चोर घूमैं बहुतेरे अलकतरा पियें साँझ सबेरे कोट पहन कर खेती करते भूमि माफिया रोज निखरते रोग नहीं पर खाँसत आवै बाँधि के मफलर आँख चुरावे टूजी मण्डल कोल घोटाला पोतस करिखा मुँह पर काला बंधक लगती न्याय व्यवस्था चींख रही झूठी समरसता संविधान के रोते सपनें हर पन्नों पर कांटे पफनें बल्लभ की बगिया मुरझाई कैसी अब यह बेला आई बिकती है खुद की परछाईं मोल लगा पर लाज न आई "योगी" तू ईमान बचा ले अपनीं दुनिया अलग सजा ले तुझसे है अंतिम अभिलाषा जन जन से कर दूर निराशा।।"योगी" योगेन्द्र शर्मा "योगी" भीषमपुर,चकि
रत्नेश चंचल

रत्नेश चंचल

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( दीपावली विशेष )💥💥💥 अंतर्मन में दीप जले चहुं ओर हो उजीयारा राग द्वेष और क्लेश रुपी सब मीट जाए अंधीयारा । रिद्धी सिद्धी समृद्धि हो यश और आयु में वृद्धि हो जीती बाजी हाथ लगे जो अबतक हमने हारा अंतर्मन में दीप जले चहुं ओर हो उजीयारा । सर पे गणपति का हाथ रहे धन लक्ष्मी का साथ रहे । किसी बेबस व लाचार का हम भी बनें सहारा अंतर्मन में दीप जले चहुं ओर हो उजीयारा । जीवन में ऐसा रंग भरें मन में सदा उमंग भरें रहे समर्पित मातृभूमि को तन,मन, धन सब सारा अंतर्मन में दीप जले चहुं ओर हो उजीयारा ।। प्रकाश पर्व दीपावली की अनंत शुभकामनाएं । रत्नेश चंचल वाराणसी संपर्क-9335505793
योगेन्द्र शर्मा “योगी”

योगेन्द्र शर्मा “योगी”

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सरहद पर जो वीर खड़े.......!🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻 जलें हजारों दीप मगर एक दिया उजाली उनकी हो सरहद पर जो वीर खड़े इस बार दीवाली उनकी हो। जगमग दीपक के लड़ियों की हर लौ मतवाली उनकी हो भरी पिटारी रश्मि पुंज की इस बार न खाली उनकी हो। मातृभूमि के खुशियों में या खुदा नज़ाकत उनकी हो पूज्यनीय एकदंत मगर इस बार इबादत उनकी हो। हर नगमे हर गीतों में हर तरफ महारत उनकी हो अम्बर तक रौशन यारों इस बार जियारत उनकी हो। साँसों के हर पन्ने पर अब कथा कहानी उनकी हो रंगों के रंगोली सी इस बार जवानी उनकी हो। वतन के माथे पर चंदा सा अमिट निशानी उनकी हो "योगी" बसुधा पर किरणे इस बार दीवानी उनकी हो। सरहद पर जो वीर खड़े इस बार दीवाली उनकी हो।।"योग
जियाऊल हक़

जियाऊल हक़

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नेता बन जाई.................. पर पटिदार, हीत नाता कारऽ तावे हमे तंग। बन जाई काहो नेता, हमार करऽतावे मन। ' दुई चार घोटाला हमू कर के छिपाएम। हिन्दू-मुस्लिम कई के हम अगीया लगाएम। पाँच साल मे हमऽ हूँ जोगाई लेहेम धन। बन जाई काहो नेता, हमार करऽतावे मन। ' गैस एजेंसी, पेट्रोल पंप के होई उद्घाटन। दस-बीस बिघा किनेम मिलऽते सिंघासन। जिला जवार हमशे नाही करी अन बन। बन जाई काहो नेता हमार करऽतावे मन। ' जियाउल हक जैतपुर सारण बिहार
अजय एहसास

अजय एहसास

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नोटबंदी के मार पड़ी है........ नोटबंदी कै मार पड़ी है आठ नबम्बर सोला मा मेहरि भई बेहोश धरे है नोट हज़ारा झोला मा । बन्द कर दिहा नोट ए भाई कहला काला धन पकड़ाई मंद भइल मंगरू कै दुकनिया बंद होइ गइल दाना पनिया । असर भइल अइसन की जइसे फसल परि गइल ओला मा नोटबंदी कै मार पड़ी है आठ नबम्बर सोला मा। सुबह सबेरे बैंक मा जावैं भीड़ मा लाइन मा लगि जावैं सुति उठि बैंक का चक्कर काटैं बड़े लोग का भितरी से बाटैं बैंको मा ता चोर भरल हैं अधिकारी के चोला मा नोटबंदी कै मार पड़ी है आठ नबम्बर सोला मा। मंत्री नेता कोउ ना लागै बारह बजे सोइ कै जागै इनकर पइसा का होइगै सब इनसे हिसाब कोइ ना मांगै इनकर पइसा भा सफेद बा अठरह बीस के तोला मा नोटबंदी कै मार पड़ी है आठ नबम्बर सोला मा। काम छोड़ लाइन मा लागी सब्जी ताइ उधारी मांगी घुरहू कहैं कि सुनो हमार मंदा सब्जी कै व्यापार पानी जस सब्जी