Tuesday, August 21

कविताएं

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रामनाथ यादव “बेखबर”

रामनाथ यादव “बेखबर”

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  जब-तक दिल में प्यार जगे थे भावों के अम्बार जगे थे। जाग उठा था मुल्क हमारा जिस दिन ये अख़बार जगे थे। तख़्त भला कैसे हिलता वो सड़कों पे दो चार जगे थे। कैसी लज्ज़त थी बातों में जब चिट्ठी जब तार जगे थे। चीख उठा था सारा अम्बर जिस दिन ये तलवार जगे थे। माँ के जगते ही लगता था मेरे भी घर-वार जगे थे। 🌻रामनाथ यादव "बेख़बर" सिताब , दियारा , बलिया(उo प्रo) एमo एo (हिंदी)
रामजियावन दास “बावला” जी

रामजियावन दास “बावला” जी

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                 【 चल तहसील कचहरी चल 】 बरखा बुन्‍नी जाड़ा पाला चलै सीत कै लहरी चल                                 चल तहसील कचहरी चल लेखपाल जी पतरा खोलैं घुमा-फिरा भकसावन बोलैं चकबंदी के भूल-भुलइया मुखिया के परधान के लेके उठि के तनी भोरहरी चल                                      चल तहसील कचहरी चल आहि रे मइया आहि रे दादा परे लगल रादा पर रादा चिथरू अउर पवारू दउरैं सिधरू अउर सोमारू दउरैं कुछ वकील पेशकार के लेके पैदल जेठ दुपहरी चल                                     चल तहसील कचहरी चल चलल मुकदमा ठाले में न्‍याय गिरल बा खाले में कवने देव के माथ नवाईं कहाँ-कहाँ परसाद चढ़ाईं परग-परग पर नागिन लोटैं फूँक-फूँक के डहरी चल                                   चल तहसील कचहरी चल हर नंबर के भयल स्‍वयंबर बाँट-बाँट के खइलैं बंदर बिचवलियन के चमकल पानी
जियाउल हक

जियाउल हक

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बचपन के याद आये लागल """"""""""""""""""""""""""""""""""""" अब जवानी के दिन आये लागल। हमार हँसी के दिन बिलाये लागल। """""""""""""""""""""""""""""""""" दुर होखे लागल अब खुशी के दिन। बचपन याद बनके रोआये लागल। """""""""""""""""""""""""""""""""""""""" मतलब से भरल बा ई पूरा संसार। वक्त आँखवा के पर्दा हटाये लागल। """""""""""""""""""""""""""""""""""" बिन तकिया के ना सुते वाला घर पर। आज हाथ के तकिया बनाके सोये लागल। """""""""""""""""""""""""""""""""""""" खो गईल निंद जिया आके बैरी शहर मे। अपनो लोगवा भी हमके भुलाये लागल। """"""""""""""""""""""""""""""""""""" जियाउल हक जैतपुर सारण ,बिहार
जियाउल हक

जियाउल हक

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""""""""#भोजपुरी गजल""""""""" -------------------------------------- दिल मे आस जगाई कइसे। प्रेम के ज्योत जलाई कइसे। -------------------------------------- कीचड़ भरल बा मजधारन मे। आपन नईया पार लगाई कइसे। ------------------------------------- नियत खराब बा इहवा सबकर। मंदिर-मस्जिद मे हम जाई कइसे। -------------------------------------- टुटल ना अभी नफरत के लाठी। मन के भ्रम हम मिटाई कइसे। -------------------------------------- सब लोगन के राग अलग बा आपन गजल जिया सुनाई कइसे। """""""""""""""""""""""""""""""""""   जियाउल हक जैतपुर सारण बिहार स्नातक विज्ञान & इंडस्ट्रीयल फायर इंजीनियर पिन कोड- 841205 मो- 8128537330
रत्नेश चंचल

रत्नेश चंचल

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तेरे शहर में आने को जी चाहता है फिर से नजरें मिलाने को जी चाहता है । जो बातें रह गयी अब तक अधुरी बैठकर सब बताने को जी चाहता है । हम दोनों का अब भी हरा जख्म है उसपे मरहम लगाने को जी चाहता है । जानता हूं की हमसे तुम्हें रंजो गम है सच कहूं तो मनाने को जी चाहता है । जिस गली से है होता गुजरना तेरा उस गली आने जाने को जी चाहता है । ये चंचल निगाहें तड़पती बहुत हैं प्यास इनकी बुझाने को जी चाहता है ।। रत्नेश चंचल वाराणसी संपर्क-9335505793
रत्नेश चंचल

रत्नेश चंचल

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घेर बदरीया रिमझिम रिमझिम बरसे लागल पानी धरती ओढ़ के मगन भइल बा फिर से चुनरीया धानीं त अंखीया जुड़ हो जाले देख के सिवनवां में मन धधाइल बाटे सबकर सवनवां में । रोपत धान में किआरी में रोपनी के गीत सुनाता बरम बाबा तर झुलाआ लागल कजरी रोज गवाता भिंजें बाल बुतुरुआ खेलत के अंगनवां में मन धधाइल बाटे सबकर सवनवां में । हरिअर भइल बगइचा देख लाठ डांड़ हरिआइल बा सुखल रहे जे नदीया ओह में ललका पानी आइल बा त होला खेल छुअंता धरती असमनवां में मन धधाइल बाटे सबकर सवनवां में । रत्नेश चंचल वाराणसी 9335505793
कवि चन्द्रशेखर मिश्र जी

कवि चन्द्रशेखर मिश्र जी

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  बस में सफर करते हुए हमारे आदर्श कवि चंद्रशेखर मिश्र जी के हृदय को एक मूंगफली बेच रहे अबोध बालक , जिसके साथ एक महोदय ने बद्तमीजी की थी, आघात पहुंचा और उनकी कलम चल पड़ी । 【उस अबोध बालक का दर्द देखिये कैसे व्यक्त करता है 】 👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇 पुस्तकों का बोझ लेकर चलने की उमर में चिनिया बदाम बेचने को चल देते हैं । दूध भात खाने का तो स्वप्न भी न देखा कभी गालियों झिड़कियों से पेट भर लेते हैं । बच्चा कहता है..........कि👇👇👇👇 धक्का मत दीजिये, खरीद लीजिये हुजूर भारत के नाते हम आपही के बेटे हैं धक्का मत दीजिये, खरीद लीजिये हुजूर भारत के नाते हम आपही के बेटे हैं पर गर्व हमें है कि हम मूंगफली बेचते हैं सुनता हूँ बड़े लोग देश बेच देते हैं ।। कव
योगेन्द्र शर्मा “योगी”

योगेन्द्र शर्मा “योगी”

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आतंकी हमले में जान गवानें वाले अमरनाथ भक्तों को समर्पित मेरी एक रचना.........!👏👏 गोली थी दहशतगर्दों की लेकिन घाव सियासी हैं अमरनाथ के भक्तों पर हमलावर कौन जेहादी हैं। मौन अभी तक जो हैं सेकुलर वो भी तो अपराधी हैं हर घटना पर निंदा केवल लगती कायर छाती है। आतंकी का धरम नहीं यह बातें कहाँ से आती हैं लेकर पत्थर भींड़ जो उमड़ी उनकी जात बताती है। हमदर्दी का चोला ओढ़े सत्ता लाश उठाती है देकर चंद खनकते सिक्के अवसर सिरफ़ भुनाती है। तुष्टिकरण की गीतें बेजां हर बार कलम जो गाती है सुख गई है स्याही उसकी या बेशर्म लजाती है। जो पुरस्कार लौटाये थे क्या ? उनको लज्जा आती है संकोच नहीं "योगी" कहता वे घर के अंदर घाती हैं। गोली थी दहशतगर्दों की लेकिन घाव सियासी है।।"योगी"
रामजियावन दास “बावला” जी

रामजियावन दास “बावला” जी

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​देश भइल आजाद मगर रण के बरबादी पउलस के सोचा आजादी पउलस के..... ? के के आपन खून बहावल के आपन सर्वस्व लुटावल केकर लड़िका बनें कलक्टर, इ ओस्तादी पउलस के सोचा आजादी पउलस के...?  केकरे आह से पर्वत टूटल शिव ब्रम्हा के आसन छूटल के योगी बन अलख जगवलस पर परसादी पउलस के सोचा आजादी पउलस के....?